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Lesson-3 पंचांग, Panchang

पंचांग (Panchang)

Panchang, tithi waar yog karan nakshatra

पंचांग :- ज्योतिष शास्त्र में पंचांग का बहुत ज्यादा महत्व है,ज्योतिष शास्त्र में इसकी जानकारी होना बहुत जरुरी होता है| पंचांग में ज्योतिष शास्त्र के प्रमुख पांच अंग होते हैं, जिसके द्वारा किसी व्यक्ति की कुंडली का गणित किया जाता है और रोज़ाना के पंचांग से हम मुहर्त आदि का विचार करते हैं|
 पंचांग के पांच अंग ( Panchang ke paanch ang) : तिथि, नक्षत्र, योग, करण और वार पंचांग के पांच अंग होते है, आगे एक एक करके इनके ऊपर विचार किया जाएगा|

तिथि( Tithi):-तिथि से सूर्य और चंद्र के बीच की दूरी का ज्ञात होता है| पंचांग में सबसे पहले तिथि को देखा जाता है, चंद्रमास के महीने को तिथि कहा जाता है| चंद्र मास में एक महीने में 30 दिन होते है, कई बार एक दिन ज्यादा कम भी हो जाता है| एक महीने में 2 पक्ष होते हैं, एक को शुकल पक्ष कहते हैं और दूसरे को कृष्ण पक्ष| इन दोनों पक्षों में 15-15 दिन होते हैं, जैसे शुकल पक्ष के पहले दिन को शुकल पक्ष प्रतिपदा कहते हैं वही कृष्ण पक्ष के पहले दिन को कृष्ण पक्ष प्रतिपदा कहते हैं|शुकल प्रतिपदा से 15 दिन पूर्णिमा तक चंद्र धीरे धीरे बढ़ता जाता है और पूर्णिमा को चंद्र पूरा दिखाई देता है और पूर्णिमा के बाद पहला दिन कृष्ण पक्ष का पहला दिन होता है जिसको हम कृष्ण पक्ष प्रतिपदा कहते हैं और कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस तक चंद्र कम होता जाता है और 15 दिन के बाद बिलकुल दिखाई नहीं देता है, वह दिन अमावस का होता है| उसके अगले दिन को फिर शुकल पक्ष की प्रतिपदा शुरू हो जाती है, ऐसे महीने के 30 दिन होते हैं | जब पृथ्वी से चंद्र और सूर्य 0° अंश (degree) पर होते हैं तब अमावस होती है जबकि पूर्णिमा को पृथ्वी से सूर्य और चंद्र का 180° अंश का अंतर हो जाता है| आपको नीचे तिथिओं के नाम और उनके अंश के हिसाब से समझते हैं |
         
          शुकल पक्ष
तिथि                   सूर्य से चंद्र की दूरी (Degree Wise) 
प्रतिपदा               0° से 12° तक
द्रितीया                12° से 24° तक
तृतीया                 24° से 36° तक
चतुर्थी                  36° से 48° तक
पंचमी                  48° से 60° तक
षष्ठी                     60° से 72° तक
सप्तमी                 72° से 84° तक
अष्टमी                  84° से 96° तक
नवमीं                   96° से 108° तक
दशमी                  108° से 120° तक
एकादशी               120° से 132° तक
द्वादशी                  132° से 144° तक
त्रयोदशी                144° से 156° तक
चतुर्दशी                 156° से 168° तक
पूर्णिमा                  168° से 180° तक

            कृष्ण पक्ष
तिथि                   सूर्य से चंद्र की दूरी (Degree Wise) 
प्रतिपदा               180° से 168° तक
द्रितीया                168° से 156° तक
तृतीया                 156° से 144° तक
चतुर्थी                  144° से 132° तक
पंचमी                  132° से 120° तक
षष्ठी                     120° से 108° तक
सप्तमी                 108° से 96° तक
अष्टमी                  96° से 84° तक
नवमीं                   84° से 72° तक
दशमी                   72° से 60° तक
एकादशी               60° से 48° तक
द्वादशी                  48° से 36° तक
त्रयोदशी                36° से 24° तक
चतुर्दशी                 24° से 12° तक
अमावस्या              12° से 0° तक

नक्षत्र(Nakshatra):- नक्षत्र के बारे में सम्पूर्ण जानकारी के लिए हमारे पेज नवग्रह और नक्षत्र के ऊपर क्लिक करें|

योग(Yog):- ज्योतिष शास्त्र में पंचांग देखने के लिए योग का भी बहुत महत्व है यह मुहर्त और कुंडली में गणता में बहुत महत्व रखते हैं| योग 27 प्रकार के होते हैं|

योग के 27 प्रकार(Types of 27 Yog):- व्याघात, वज्र, व्यतिपात, परिध, सिद्ध, शुभ, ब्रह्मा, वैधृति, आयुष्मान, हर्षण, सिद्धि, वरीयान, शिव, साध्य, शुकल, ऐन्द्र, विष्कुंभ, शोबन, सुकर्मा, शूल, वृद्धि, प्रीति, अतिगण्ड, धृति, गण्ड, ध्रुव, सौभाग्य

वार(waar):- वार सात होते हैं जैसे रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार| ज्योतिष शास्त्र में वार रात के 12 बजे नहीं बल्कि सूर्यउदय के साथ शुरू होता है | यह ज्योतिष शास्त्र की गणता में बहुत महत्व रखते हैं|
करण(Karan):- करण भी पंचांग का बहुत महत्पूर्ण अंग है| पंचांग में करण से शुभ अशुभ, जन्म लेने वाले बच्चे का भाग्य और उसके स्वाभाव का विचार किया जाता है| एक तिथि के आधे भाग को करण कहा जाता है | एक चंद्र मास में 30 तिथि होती है, ऐसे ही एक चंद्रमास में 60 करण होते हैं| करण कुल 11 होते हैं| किंस्तुध्न, शकुन, चतुष्पद, नाग, यह चार स्थिर करण हैं, जो के माह में सिर्फ एक बार आते हैं, जबकि बाकी सात करण चर होते हैं जो बार बार आते हैं| यह सात चर करण हैं : बव, बालव, कौलव, तैतिल, गरज, वणिज और विषिट हैं| इनमें से विषिट करण को शुभ नहीं माना जाता है|आगे हम कौन से करण में जन्म लेने वाले व्यक्ति का स्वाभाव और सौभाग्य कैसा होगा, उस पर विचार करेंगे|
करण पर विचार :-
1. बव करण :- इस करण में जन्म लेने वाला व्यक्ति  सम्मानित, धार्मिक, शुभ कार्य करने वाला होता है|
2. बालव करण :- बालव करण में जन्म लेने वाला व्यक्ति धार्मिक, धन और सुख से परिपूर्ण और विद्या से युक्त होता है |
3. कौलव करण :- इस करण में जन्म लेने वाला व्यक्ति सबके साथ प्रीति रखने वाला और मित्रों से अच्छे सम्बन्ध रखने वाला होता है|
4. तैतिल करण :- इस करण में जन्म लेने वाला व्यक्ति धनवान सबसे सनेह रखने वाला और अधिक घरों का स्वामी होता है|
5. गरज कारण :- गरज कारण में जन्म लेने वाला व्यक्ति खेती करने वाला, गृहकार्यों को सँभालने वाला और मेहनत के द्वारा कार्यों को सिद्ध करने वाला होता है|
6. वणिज करण :- वणिज करण में जन्म लेने वाला व्यक्ति व्यापारी होता है|
7. विषिट करण :- विषिट करण में जन्म लेने वाला व्यक्ति परस्त्री गामी और गलत कार्यों को करने वाला होता है|
8. शकुनि करण :- शकुनि करण में जन्म लेने वाला व्यक्ति वैध अथवा औषधियों का कार्य करने वाला होता है|
9. नाग करण :- इस करण में जन्म लेने वाला व्यक्ति अपने सज्जनों का प्रिय, प्रेमी, कठिन कार्यकर्ता, दुर्भाग्यशाली और चंचल नेत्रों वाला होता है|
10. चतुष्पद करण :- इस कारण में जन्म लेने वाला व्यक्ति देवताओं का भक, धार्मिक और पशुओं से प्रेम करने वाला होता है|
11.किंस्तुध्न करण : इस करण में जन्म लेने वाला व्यक्ति शुभ कार्यों को करने वाला, हर तरफ से मंगल करने वाला होता है|

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