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Lesson-10 कुंडली में राहु और केतु, Kundali mein rahu ketu

कुंडली में राहु और केतु का फल
Kundali mein Rahu aur Ketu ka Fal

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कुंडली में राहु और केतु ग्रह ऐसे होते हैं जिनकी अपनी कोई राशि नहीं होती है, इसलिए कुंडली में राहु और केतु के अच्छे और बुरे फल जानने के लिए 3-4 सिद्धांत लागू होते हैं| यदि आप उन सिद्धांतों को अच्छी तरह से समझ जाते हो तो आप बहुत आसानी से यह जान सकते हो कि कुंडली में राहु और केतु अच्छे फल देने वाले(योग कारक) ग्रह हैं या बुरे फल देने वाले (मारक ग्रह)|इन सिद्धांतो को जानने से पहले आप राहु और केतु की कुछ विषेशताएं जान लीजिए|

राहु-केतु की विषेशताएं:-
1. राहु और केतु ग्रह कुंडली में सदैव वक्रीय चलते हैं| इसका अर्थ होता है कि उलटी दिशा में चलते हैं| यदि कोई ग्रह कुंडली में वक्रीय हो जाता है अर्थात उलटी दिशा में चलना शुरू करता है तो वह अच्छे या बुरे फल देने में 2 गुना अधिक शक्तिशाली हो जाता है|
2. कुंडली में राहु और केतु सदैव एक समान गति से चलते हैं| यह कुंडली में बैठते भी एक-दूसरे के सामने हैं अर्थात यदि राहु कुंडली में प्रथम भाव में बैठा होगा तो केतु सप्तम भाव में होगा और यदि राहु द्रितीय भाव में बैठा होगा तो केतु अष्ट भाव में बैठेगा| कुंडली में राहु और केतु का अंश(Degree) भी एक बराबर होती है, यदि राहु  10° अंश(Degree) का होगा तो केतु भी 10° अंश(डिग्री) का होगा|
अब हम जानेंगे कि राहु और केतु कुंडली में अच्छे या बुरे फल कैसे देते हैं|ज्योतिष विज्ञान के मुताबिक उनके ऊपर जो सिद्धांत लागू होते हैं उसको गहराई से जानते हैं|

पहला सिद्धांत:

आपको पहले बता चुके हैं कि राहु और केतु की अपनी कोई राशि नहीं होती है, इसलिए यह कुंडली में अपनी उच्च राशि और मित्र राशि में अच्छे फल देते हैं और नीच राशि अथवा शत्रु राशि में बुरे फल देते हैं|
हम आपको नीचे राहु और केतु की उच्च, नीच, मित्र और शत्रु राशि की जानकारी देते हैं|राहु और केतु अपनी उच्च और मित्र राशि में अच्छे फल देते हैं, जबकि अपनी नीच और शत्रु राशि में बुरा फल देते हैं|

राहु की उच्च राशि(Rahu ki uch rashi):-

राशि नंबर 2 अर्थात वृष राशि
राशि नंबर 3 अर्थात मिथुन राशि


राहु की मित्र राशि(Rahu ki mitra rashi)

राशि नंबर 6 अर्थात कन्या राशि
राशि नंबर 7 अर्थात तुला राशि
राशि नंबर 10 अर्थात मकर राशि
राशि नंबर 11 अर्थात कुंभ राशि

केतु की उच्च राशि(Ketu ki uch rashi)

राशि नंबर 8 अर्थात वृश्चिक राशि
राशि नंबर 9 अर्थात धनु राशि

केतु की मित्र राशि(Ketu ki mitra rashi)

राशि नंबर 6 अर्थात कन्या राशि
राशि नंबर 7 अर्थात तुला राशि
राशि नंबर 10 अर्थात मकर राशि
राशि नंबर 11 अर्थात कुंभ राशि

यदि कुंडली में राहु और केतु ऊपर बताई गई अपनी उच्च और मित्र राशि के साथ बैठे होंगे तो अच्छे फल देंगे|

राहु की नीच राशि(Rahu ki Neech Rashi)

राशि नंबर 8 अर्थात वृश्चिक राशि
राशि नंबर 9 अर्थात धनु राशि

राहु की शत्रु राशि(Rahu ki Shatru Rashi)

राशि नंबर 1 अर्थात मेष राशि
राशि नंबर 4 अर्थात कर्क राशि
राशि नंबर 5 अर्थात सिंह राशि
राशि नंबर 12 अर्थात मीन राशि

केतु की नीच राशि(Ketu ki Neech rashi)

राशि नंबर 2 अर्थात वृष राशि
राशि नंबर 3 अर्थात मिथुन राशि

केतु की शत्रु राशि(Ketu ki Shatru Rashi)

राशि नंबर 1 अर्थात मेष राशि
राशि नंबर 4 अर्थात कर्क राशि
राशि नंबर 5 अर्थात सिंह राशि
राशि नंबर 12 अर्थात मीन राशि

यदि कुंडली में राहु और केतु अपनी नीच राशि या शत्रु राशि में बैठे हो तो वह अपना बुरा फल देते हैं|

दूसरा सिद्धांत:-

यदि राहु और केतु कुंडली में त्रिक भाव(6, 8, 12) और तृतीय(3) भाव में बैठे हो और फिर चाहे वह अपनी उच्च राशि या मित्र राशि के साथ बैठे हो, मगर  यहाँ पर यह बुरे फल ही देंगे|

तीसरा सिद्धांत:-

राहु या केतु की अपनी कोई राशि नहीं होती,  इसलिए यह ग्रह जिस भी राशि में बैठे होते हैं, उस राशि के स्वामी की स्थिति के अनुसार फल देते हैं| राहु और केतु जिस राशि में बैठे होते हैं, यदि उस राशि का स्वामी किसी बुरे भाव जैसे त्रिक भाव(6, 8, 12) या तृतीय(3) भाव में बैठा हो तब भी राहु और केतु मारक ग्रह हो जाते हैं और बुरे फल देते हैं|

आपको कुछ उदाहरण देकर बताते हैं कि राहु और केतु कैसे अच्छा या बुरा फल देते हैं|
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जैसा आप चित्र नंबर 1 में देख रहें हो कि यहाँ पर राहु प्रथम भाव में अपनी उच्च राशि नंबर 3(मिथुन) के साथ बैठा है और केतु भी  सप्तम भाव में अपनी उच्च राशि नंबर 9 (धनु) के साथ बैठे हुए हैं| यहाँ पर यह दोनों ग्रह योग कारक हो गए और यहाँ पर यह अच्छा फल देंगे|
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जैसा आप चित्र नंबर 2 में देख रहें हो कि यहाँ पर राहु सप्तम भाव में अपनी नीच राशि नंबर 9(धनु) के साथ बैठे हुए हैं और केतु यहाँ अपनी नीच राशि नंबर 3(मिथुन) के साथ बैठे हुए हैं|इसलिए यहाँ पर राहु और केतु दोनों मारक(बुरे) ग्रह  होने के कारण यहाँ पर बुरा फल देंगे|
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जैसा आप चित्र नंबर 3 में देख रहें हो यहाँ पर राहु ग्रह चतुर्थ भाव में अपनी मित्र राशि नंबर 6(कन्या) के साथ बैठे हैं और केतु ग्रह दशम भाव में अपनी शत्रु राशि नंबर 12(मीन) के साथ बैठे हुए हैं| यहाँ पर राहु मित्र राशि के साथ बैठे होने के कारण अच्छा फल देंगे जबकि केतु अपनी शत्रु राशि के साथ बैठे होने के कारण बुरा फल देंगे|
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जैसा आप चित्र नंबर 4 में देख रहें हो कि यहाँ पर राहु द्रितीय भाव में अपनी शत्रु राशि नंबर 4(कर्क) के साथ बैठा हुआ है, इस लिए यहाँ पर राहु बुरे फल देगा और यहाँ पर केतु अपनी मित्र राशि नंबर 10(मकर) के साथ बैठे हुए हैं, मगर आप यहाँ देख रहें हो कि केतु भले ही अपनी मित्र राशि में बैठे हैं पर बैठे अष्टम भाव में हैं और आपको पहले बता चुके हैं कि कुंडली के त्रिक भाव (6, 8, 12) और तृतीय भाव में राहु और केतु अपनी उच्च और मित्र राशि में भी बुरे फल ही देते हैं|
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आप ऊपर चित्र नंबर 5 में देख रहें हो कि इस कुंडली में राहु प्रथम भाव में अपनी उच्च राशि नंबर 3(मिथुन) के साथ बैठे होने के कारण यहाँ पर अच्छे फल देने वाले गृह बन जाते हैं, मगर आप यहाँ पर देख सकते हो कि राहु अपनी जिस उच्च राशि नंबर 3 (मिथुन) के साथ बैठे हैं, उसका स्वामी गृह बुध कुंडली के षष्ठ(6) भाव अर्थात त्रिक भाव में बैठे हैं और राहु यहाँ पर भी बुरे फल ही प्रदान करते हैं| इसलिए यदि राहु या केतु अपनी उच्च या मित्र राशि में बैठे हो और उस मित्र राशि का स्वामी त्रिक भाव(6, 8, 12) या तृतीय भाव में से किसी भाव में बैठा हो तब भी राहु और केतु बुरे फल देते हैं|

चौथा सिद्धांत 

rahu ketu in kundali,
rahu ketu in kundali

राहु केतु का फल देखने के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। राहु-केतु का उच्च-नीच राशि वाला सिद्धांत सिर्फ आपको 20-30 प्रतिशत परिणाम ही देगा, मगर कुंडली में  राहु-केतु पर यह नियम लगाकर फलादेश किया जाये तो आपको 70-80 प्रतिशत परिणाम देखने को मिलेंगे। जैसे आपको पता है कि कुंडली में राहु और केतु का अपना कोई भाव और राशि नहीं होती है और यह जिस राशि में बैठते हैं उस राशि का स्वामी ग्रह, राहु-केतु  के साथ युति बनाकर बैठे ग्रह और राहु-केतु जिस नक्षत्र में बैठे हैं उस नक्षत्र के स्वामी ग्रह की स्थिति के अनुसार फल देते हैं। 
अब हम आपको सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत के बारे में बताते हैं कि राहु और केतु अपना अच्छा या बुरा फल कैसे देते हैं। आपको ऊपर चित्र नंबर.6 और चित्र नंबर.7 दिया गया है। इसके माध्यम से हम आपको समझते हैं कि राहु केतु का कुंडली में कैसा फल होगा। जैसे आप चित्र नंबर 6 में देख रहे हो राहु यहाँ सप्तम भाव में कन्या राशि में बैठा है। अब हमको यह तो पता है कि राहु-केतु जिस राशि में बैठे होते हैं उस राशि के स्वामी ग्रह की स्थिति के अनुसार फल देते हैं। जैसे आप चित्र नंबर 6 में देख रहे हो कि राहु सप्तम भाव में कन्या राशि में बैठे हैं और कन्या राशि का स्वामी ग्रह बुध एकादश भाव (गियारवें) में बैठा है। अब यहाँ पर राहु की पंचम दृष्टि बुध पर आ रही है मगर बुध की दृष्टि राहु पर नहीं है। अब हम यहाँ पर यह कह सकते हैं कि बुध ग्रह राहु के प्रभाव में आ गया है। अब यहाँ पर राहु और बुध का फल क्या होगा? आपको यहाँ पर बता दें कि यदि ऐसी स्थिति बन जाये कि राहु जिस राशि में बैठा हो यदि उसका स्वामी ग्रह राहु के प्रभाव में आ जाये तो राहु तो अपनी महादशा और अंतरदशा में बुध को के प्रभाव में  लेकर बहुत अच्छे फल देगा मगर जब बुध की महादशा या अंतरदशा चलेगी तब बुध राहु के प्रभाव में आने के कारण राहु के बुरे कारकत्वों का फल बुध की दशा में मिलेगा। ऐसे ही यदि राहु या केतु जिस राशि में बैठे हों यदि उस राशि के स्वामी ग्रह की दृष्टि राहु पर आ जाए और राहु की वापिस दृस्टि उस ग्रह पर ना आये तो राहु उस ग्रह के प्रभाव में आ जाने से उसके कारकतत्वों में उसकी स्थिति के अनुसार फल देगा। यदि वह ग्रह अच्छी स्थिति में बैठा होगा तो राहु अपनी महादशा में अच्छा फल देगा और जिसकी राशि में राहु या केतु बैठे होंगे उसकी दशा में भी राहु का कोई प्रभाव न होने से वह ग्रह अच्छा फल ही देगा। मगर यहाँ पर और ग्रहों की दृष्टि का विचार करके ही फल बताने चाहिए। जैसे आप चित्र नंबर 7 में देख रहे हों कि राहु नवम भाव में वृश्चिक राशि में बैठे हैं और वृश्चिक राशि का स्वामी ग्रह मंगल योग कारक होकर धन भाव अर्थात दृत्य भाव में बैठा हुआ है और यहाँ पर मंगल की आठवीं दृष्टि राहु पर पड़ रही है मगर राहु की कोई भी दृष्टि मंगल पर नहीं है। अब यहाँ पर मंगल पर राहु का कोई प्रभाव नहीं रहा है। अब यहाँ पर मंगल की दशा बहुत अच्छी रहेगी और मंगल के ऊपर राहु का कोई प्रभाव नहीं रहेगा उल्टा राहु के ऊपर मंगल का प्रभाव रहेगा। यहाँ पर हम ऐसा भी कह सकते हैं कि राहु मंगल के आधीन आ चूका है और अब जब भी राहु की दशा आएगी तब वह मंगल से जुड़े हुए फल भी देगा। 
यदि राहु जिस राशि में बैठा है है उस राशि के स्वामी ग्रह के ऊपर राहु की दृष्टि आ जाए और वापिस उस ग्रह की भी राहु पर दृष्टि पड़ रही हो तब भी वह ग्रह राहु की चपेट में आ जाता है मगर यहाँ पर वापिस उसकी दृष्टि पड़ने से कुछ प्रभाव कम हो जाता है। 
ऐसे ही राहु और केतु किसी भाव में जिस ग्रह के साथ युति बनाकर बैठे हों तब राहु या केतु उस ग्रह की स्थिति और कारकतत्वों के मुताबिक भी फल देंगे, मगर जब राहु के साथ युति बनाकर बैठे ग्रह की दशा आएगी तब राहु और केतु उसको दूषित जरूर करेंगे और राहु-केतु के साथ युति बनाकर बैठे ग्रहों के ऊपर राहु-केतु का प्रभाव आने से वह राहु और केतु के बुरे कारकतत्वों का फल जरूर देंगे। इसी लिए राहु और केतु के साथ किसी ग्रह की युति अच्छी नहीं मानी जाती है। यहाँ पर दोनों ग्रहों की अंशात्मक दूरी जरूर देख लेनी चाहिए। जितनी किसी ग्रह की अंशात्मक दूरी राहु या केतु से कम होगी उतना राहु या केतु का उस ग्रह पर प्रभाव ज्यादा होगा। 

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