Skip to main content

Lesson-15, पंच महांपुरुष योग - Panch Mahapurush Yog

कुंडली में पंच महांपुरष योग
Kundli mein Panch-Mahapurush Yog

पंच-महांपुरुष योग का अर्थ( Meaning of Panch-Mahapurush Yoga):- कुंडली  मे पांच ग्रहों  (मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि) के द्वारा पांच प्रकार के राज योग बनते हैं, उनको पंच-महापुरुष योग कहा जाता है| कुंडली में मंगल गृह से रुचक नाम का महापुरष योग बनता है, बुध गृह से भद्र नामक महापुरष योग बनता है, बृहस्पति से हंस नाम का महापुरष योग बनता है, शुक्र गृह से मालव्य नाम का महापुरष योग बनता है और शनि गृह से शश नाम का महापुरष योग बनता है |  इन पांच प्रकार के योग को पंच महापुरष योग कहा जाता है| यदि कुंडली में इनमें से कोई योग बनता है तो उस गृह की महां-दशा या अंतर-दशा में व्यक्ति को राज योग की प्राप्ति होती है| कई व्यक्तिओं की कुंडलियों में एक से अधिक भी महांपुरुष योग बनते हैं|
कुंडली में पंच महांपुरुष योग बनने के लिए कुछ सिद्धांत लागू होते है| इन सभी सिद्धांतों के लागू होने के बाद ही कुंडली में पंच-महांपुरुष योग माना जाता है| कुंडली में प्रत्येक महांपुरुष योग अपने अलग-अलग फल देते हैं और आगे हम पांचों महांपुरुष योग के बारे में विस्तार से बताएँगे|
पंच-महांपुरुष योग के सिद्धांत जानने से पहले आप पंच महांपुरुष योग बनाने वाले पांचों ग्रहों की स्वं राशिओं और उच्च राशियों के बारे में जानकारी प्राप्त कर लें, तभी आप इसके सिद्धांत जान पायोगे|

गृह              स्वं राशि नाम और उसका नंबर 
मंगल           मेष(1),  वृश्चिक(8)
बुध             मिथुन (3),  कन्या(6) 
बृहस्पति       धनु(9),  मीन(12)
शुक्र             वृषभ(2),  तुला(7) 
शनि             मकर(10),  कुंभ(11) 

गृह              उच्च राशि 
मंगल           मकर (10)
बुध              कन्या (6)
गुरु              कर्क (4)
शुक्र             मीन (12)
शनि             तुला(7) 

आपको ऊपर बताया गया है कि कुंडली के 12 भावों में जो नंबर लिखे होते हैं, वह राशियों के नंबर होते हैं| आपको ऊपर पंच महांपुरुष योग बनाने वाले सभी 5 ग्रहों की स्वं राशियां और उच्च राशियों के बारे में बताया गया है| सूर्य और चंद्र की एक-एक राशि होती है, इसलिए उनसे महांपुरुष योग नहीं बनता है|

पहला सिद्धांत या शर्त 
कुंडली के केंद्र भाव में गृह का स्वं राशि या उच्च राशि में बैठना:- सबसे पहले आपको यह पता होना चाहिए कि कुंडली के प्रथम (1), चतुर्थ (4), सप्तम (7) और दशम (10) भाव को केंद्र भाव कहा जाता है| दूसरी बात आपको यह पता होनी चाहिए कि कुंडली में 12 भावों में जो नंबर लिखे होते हैं वह राशियों के नंबर होते हैं|
जैसे ऊपर चित्र नंबर.1 में आप देख रहे हो कि यहाँ कुंडली के प्रथम या लग्न भाव में 3 नंबर लिखा हुआ है और 3 नंबर मिथुन राशि का नंबर होता है| यहाँ पर अपने समझ लेना है कि कुंडली के प्रथम भाव में मिथुन राशि है| 
पंच महांपुरुष योग बनने की पहली शर्त यह होती है कि यदि कोई गृह कुंडली के केंद्र भावों (1, 4, 7, 10) में  से किसी एक भाव में अपनी स्वं राशि या उच्च राशि में बैठ जाए तो पंच महांपुरुष बनने की पहली शर्त पूरी हो जाती है|हम आपको नीचे उदाहरण देकर समझाते हैं|
जैसे आप ऊपर कुंडली नंबर एक में देख रहें हों यहाँ पर बुध प्रथम भाव में राशि नंबर 3 अर्थात मिथुन राशि के साथ बैठा है और राशि नंबर 3(मिथुन) बुध की स्वं राशि है| इस तरह से बुध कुंडली के प्रथम केंद्र भाव में अपनी स्वं राशि में बैठा हुआ है, तो यहाँ पर बुध गृह से भद्र महापुरष योग बनने की पहली शर्त पूरी हो जाती है|
ऐसे ही चित्र नंबर. 1 में जैसा आप देख रहे हो कि कुंडली के चतुर्थ भाव में बुध राशि नंबर 6(कन्या) में बैठा हुआ है, यह राशि बुध की स्वं राशि और उच्च राशि भी है| यहाँ पर भी पहली शर्त पूरी हो जाती है|
चित्र नंबर.1 में गुरु सप्तम भाव में राशि नंबर 9 (धनु) में बैठे हैं, यह गुरु की स्वं राशि है और केंद्र भाव में होने के कारण यहाँ पर भी गुरु गृह से हंस नाम का महापुरुष योग बनने की पहली शर्त पूरी हो जाती है| ऐसे ही चित्र नंबर. 1 में गुरु केंद्र के दशम भाव में राशि नंबर 12 (मीन) में बैठा हुआ है, यह राशि भी गुरु की स्वं राशि है, इसलिए यहाँ पर भी हंस महापुरुष योग बनने की पहली शर्त पूरी हो जाती है| 
ऐसे ही इसकी एक और उदाहरण आप चित्र नंबर 2 में देख सकते हो कि यहाँ पर शनि प्रथम भाव में अपनी स्वं राशि नंबर 10(मकर) में बैठा हुआ है, तो यहाँ पर शश नाम का महापुरुष योग बनने की पहली शर्त पूरी हो गई है और दूसरी उदाहरण यहाँ पर शनि दशम भाव में अपनी उच्च राशि नंबर 7 (तुला) में बैठा हुआ है,  तो यहाँ पर भी शनि गृह से शश महापुरुष योग बनने की पहली शर्त पूरी हो जाती है| 

अपने पहली शर्त यही याद रखनी है कि यदि ऊपर बताए गए पाँच ग्रहों में से कोई गृह केंद्र भाव(1, 4, 7, 10) में से किसी एक भाव में अपनी स्वं राशि या उच्च राशि में बैठा हो तो महां पुरुष योग बनने की पहली शर्त पूरी हो जाती है|

दूसरा सिद्धांत या शर्त 
गृह का मारक होना:- यदि पंच महां पुरुष योग बनाने की आपकी ऊपर बताई पहली शर्त पूरी हो जाती है तो साथ में आपको यह देखना होता है कि जो गृह कुंडली में पंच महापुरुष योग बना रहा है, कहीं वह गृह कुंडली में मारक गृह(शत्रु गृह) तो नहीं है| कुंडली में मारक गृह की पहचान के लिए आप कुंडली में योग कारक और कारक गृह पेज पर क्लिक करके जानकारी हासिल कर सकते हो| 
यदि आपकी कुंडली में पंच महांपुरुष योग बनने की पहली शर्त पूरी हो भी जाती है, मगर साथ में यदि वह गृह कुंडली में मारक गृह हुआ तो पंच-महांपुरुष योग भंग हो जाता है|मारकेश गृह के द्वारा पंच महांपुरुष योग नहीं बनता है| 
इसकी उदाहरण आप चित्र नंबर. 3 में देख सकते हो कि यहाँ पर शनि गृह कुंडली के सप्तम भाव में अपनी स्वं राशि में तो बैठे हुए हैं, मगर इस कुंडली में शनि की राशि नंबर 11(कुंभ) अष्टम भाव में होने के कारण यहाँ पर शनि मारक गृह हो जाता है और इस स्थिति में महांपुरुष योग नहीं माना जाएगा| 

तीसरा सिद्धांत या शर्त 
गृह का अंश(Degree):- आपने ऊपर दोनों सिद्धांत देखने के बाद लग्न कुंडली में देखना है कि जो गृह पंच महांपुरुष योग बना रहा है, उसका अंश(Degree) कितनी है|प्रत्येक गृह 0°-5° डिग्री तक बाल्य अवस्था में होता है, यहाँ पर वह 25% परिणाम देता है| 5°-10° डिग्री तक गृह कुमार अवस्था में होता है, यहाँ पर गृह अपने 50% परिणाम देता है| कुंडली में 10°-20° डिग्री तक गृह अपनी युवा अवस्था में होता है और यहाँ पर वह अपने 100% परिणाम देता है| 20°-25° डिग्री तक गृह वृद्ध अवस्था में होता है, यहाँ पर वह अपने 50% परिणाम देता है| 25°-30° डिग्री तक गृह मृत अवस्था में होता है, यहाँ पर शरुवात 25, 26, 27 डिग्री तक वह 25% परिणाम देता है, मगर 28, 29, 30 डिग्री तक वह ना के बराबर फल देता है|
इसलिए यदि आपकी कुंडली में ऊपर बताए गए 2 सिद्धांत लागू होने पर पंच-महांपुरुष योग बन भी जाता है, तो आप उस गृह की डिग्री देख लें कि वह आपको कितने प्रतिशत परिणाम देगा| कुंडली में यदि डिग्री कम या अधिक होने से गृह का बल कम हो जाता है और वह अपना पूर्ण फल देने दे समक्ष नहीं रहता है तो उस गृह का रतन धारण करके आप उसका बल बढ़ा सकते हो|

चौथा सिद्धांत 
गृह की महांदशा और अंतरदशा:- कई व्यक्ति कहते हैं कि हमारी कुंडली में पंच महांपुरुष योग बनने पर भी हमें कोई परिणाम नहीं मिल रहा है, तो आपको यहाँ पर बता दें कि यदि आपकी कुंडली में ऊपर बताए गए तीनों सिद्धांत लागू होने से पंच महांपुरुष योग में से कोई योग बन भी जाता है, तो वह अपना पूर्ण फल तभी देगा जब उस महांपुरुष योग बनाने वाले गृह की महांदशा या अंतरदशा चलेगी| 
यदि आपकी कुंडली में ऊपर बताए चारों सिद्धांत लागू होने से कोई गृह पंच महांपुरुष योग में से कोई योग बनाता है तो वह अपने पूर्ण अच्छे परिणाम देगा और आपकी कुंडली में राज योग बना देगा|

हम आपको आगे बताएँगे कि किस गृह से कौन सा पंच महांपुरुष योग बनेगा और उसके क्या अच्छे परिणाम मिलेंगे|








Comments

Popular posts from this blog

Lesson-4 कुंडली के बारह भाव, Kundli ke 12 bhav

  कुंडली के बारह भाव (Kundali ke 12 bhav) चित्र नंबर.1 यह जो आप ऊपर कुंडली के बारह भाव देख रहे हो, असल में यह आकाश को बारह भागों में बांटा गया है| ज्योतिष विज्ञान में आकाश के 360° अंश(Degree) के नक़्शे को कुंडली के बारह भावों को बारह राशिओं में बांटा गया है और प्रत्येक भाव किसी एक राशि का भाव होता है| पंचांग के द्वारा किसी व्यक्ति के जन्म के सम्य और स्थान के मुताबिक उस सम्य ग्रहों की स्थिति के अनुसार व्यक्ति की जन्म लग्न कुंडली बनाई जाती है और उस सम्य अथवा स्थान के हिसाब से उस सम्य जो ग्रहों और राशिओं की स्थिति होती है उसको इस लगन कुंडली में लिखा जाता है| प्रत्येक भाव में कोई गृह 30° अंश(Degree) तक चलता है और फिर अगले भाव में चला जाता है, अंश(Degree) के बारे में हम आगे पढ़ेंगे| कुंडली देखने के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण जन्म लगन कुंडली होती है इसके साथ ही हम व्यक्ति की जन्म के सम्य के ग्रहों की स्थिति देख सकते हैं|ऊपर जैसे हमने कुंडली दिखाकर बताया है के भावों को कुंडली में लिखते कैसे हैं, अपने इस प्रथम भाव से द्वादश भाव तक कैसे क्रमांक इन भावों की गणता करनी है यह अच्छी तरह ...

पन्ना रत्न धारण करने के लाभ - Emerald (Panna) stone benefits in hindi

पन्ना रत्न धारण करने के लाभ Emerald stone benefits in hindi पन्ना रत्न के लाभ और पहचान (Benefits of Emerald Stone):-  पन्ना रत्न बुध ग्रह का रत्न होता है। इस रत्न को बुध ग्रह के बल को बढ़ाने के लिए धारण किया जाता है। बुध ग्रह हमारी बुद्धि का कारक ग्रह होता है और इसके रत्न पन्ना को धारण करने से हमारी बुद्धि का बल बढ़ता है और हमारी समरण शक्ति बढ़ती है। पन्ना रत्न धारण करने से व्यक्ति को ज्योतिष, पत्रकारी, शिक्षक, वकालत के क्षेत्र में लाभ मिलता है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में बुध सूर्य से अस्त हो या बलहीन हो तब इसका रत्न पन्ना को धारण करने से बुध ग्रह को बल मिलता है।   इसके अतिरिक्त बुध ग्रह कुंडली के जिस भाव में बैठा हो, जिन भावों में उसकी मिथुन और कन्या राशि हो और जिन भाव पर बुध की दृष्टि हो, पन्ना रत्न धारण करने से उन भावों के फलों में वृद्धि होती है।  रत्न क्यों धारण करना चाहिए ?  -    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने पिछले जन्म के संचित कर्मों को साथ लेकर जन्म लेता है और उसके पिछले जन्म के संचित कर्मों के मुताबिक उसकी जन्म कुंडली का नि...

बटुक भैरव मंत्र साधना सम्पूर्ण विधि - Batuk Bhairav Mantra Sadhna

बटुक भैरव मंत्र साधना Batuk Bhairav Mantra Sadhna  बटुक भैरव बहुत ही शीघ्र प्रसन्न होने वाले और तुरंत फल देने वाले देवता हैं। यह दुर्गा माता के लाडले पुत्र और शिव के अवतार हैं। यदि इनको अपना इष्ट बनाकर इनकी साधना प्रारम्भ की जाए तो आपकी ज़िंदगी के सभी कष्ट धीरे-धीरे ख़तम होने लगते हैं। नवग्रहों में से किसी भी गृह का दोष कुंडली में चल रहा हो आप बटुक भैरव जी के मंत्र की साधना करके उसका निवारण कर सकते हो।  यदि कोई साधक इनको अपना इष्ट मानकर रोज़ाना इनके मंत्र का जाप श्रद्धा और विश्वास के साथ करने लग जाता है तो बटुक भैरव जी आठों पहर (24 घंटे) उसकी छाया की तरह साथ रहकर रक्षा करते हैं। बटुक भैरव जी का जिस घर में मंत्र जाप रोज़ाना होता हो वहां पर जादू-टोना या कोई भी बुरी शक्ति का प्रभाव नहीं रहता है। बटुक भैरव जी का तीनों लोक में ऐसा प्रभाव है कि काल भी इनके नाम से कांपता है। बटुक भैरव मंत्र साधना के कुछ दिनों के बाद ही व्यक्ति को अनुभूतियाँ होनी शुरू हो जाती हैं। साधना के दौरान कई तरह के चमत्कार होने शुरू हो जाते हैं। यह सब बातें मैं अपने खुद के अनुभव से लिख रहा हूं। मैंने जिस विधि से बट...

हवन की विधि और महत्व, Havan ki vidhi

हवन की विधि और महत्व Hawan Vidhi at home हवन शुरू करने की विधि और मंत्र (Havan shuru karne ka mantra aur vidhi)-  कई साधक ऐसे होते हैं जो हवन करने की जटिल प्रक्रिया, मुश्किल से मिलने वाली सामग्री और संस्कृत के कठिन श्लोकों के कारण हवन नहीं कर पाते हैं| हम आपको यहाँ हवन की बहुत सरल विधि बताएंगे, इस विधि से आप खुद आसानी से मिलने वाली सामग्री के साथ हवन कर सकते हैं| यह जो विधि बताई जा रही है इसका प्रयोग शांति कर्म और देव हवन के लिए करना है| नवग्रह हवन, तामस हवन और कौड़ा हवन का प्रयोग अलग विधि और सामग्री से होता है| इसके लिए आप अलग से हमारे ब्लॉग पर विधि विधान देख सकते हो|  हवन का महत्व- हिन्दू धर्म में हवन का बहुत महत्व है| हिन्दू धर्म में 4 प्रमुख यज्ञ का वर्णन है, उसमें से हवन यज्ञ या देव यज्ञ को सबसे प्रमुख स्थान प्राप्त है| हिन्दू धर्म में 4 यज्ञ का नाम मनुष्य यज्ञ, पितर यज्ञ, भूत यज्ञ और देव यज्ञ है,  इसमें मनुष्य यज्ञ पृथ्वी के लोगों की भलाई के लिए किया जाता है, पितर यज्ञ स्वर्ग सिधार चुके पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है, भूत यज्ञ पृथ्वी के पशु-पक्षिय...

कुंडली में महाभाग्य योग - Mahabhagya Yog in Kundali in hindi

कुंडली में महाभाग्य योग  Mahabhagya Yog in Kundali कुंडली में महाभाग्य योग- कुंडली में महाभाग्य योग एक ऐसा योग है जिसकी कुंडली में यह योग पूर्ण रूप से बनता है। वह व्यक्ति ज़िंदगी में हर मुकाम को प्राप्त करने की क्षमता रखता है। कुंडली में महाभाग्य योग बनने वाले व्यक्ति को ज़िंदगी में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं मगर फिर भी ऐसे व्यक्ति की किस्मत उसका ऐसा साथ देती है कि उसके सभी कार्य सम्पूर्ण जरूर होते हैं। ऐसा योग बनने वाले व्यक्ति कि बारे में दुनिया यदि सोच रखती है कि इस व्यक्ति की किस्मत बहुत अच्छी है। महाभाग्य योग पुरुष और स्त्री को दोनों की कुंडली में अलग-अलग नियमों से बनता है। हम आपको आगे महाभाग्य योग बनाने वाले सभी नियमों की जानकारी देते हैं और साथ कुंडली में यह योग भंग कैसे होता है उसकी जानकारी भी देते हैं।  पुरुष की कुंडली में महाभाग्य योग  पहला नियम - पहला नियम यह है कि कुंडली में महाभाग्य योग होने के लिए पुरुष की कुंडली में लग्न भाव, सूर्य और चंद्र ग्रह विषम राशिओं में होने चाहिए अर्थात इनकी राशि 1, 3, 5, 7, 9  और 11  होनी चाहिए।  जैसे आप ऊपर चित्र ...

बाबा कालीवीर चालीसा और आरती, Baba Kaliveer ji Chalisa Aarti

बाबा कालीवीर चालीसा और आरती  कालीवीर चालीसा  काली-पुत्र का नाम ध्याऊ, कथा विमल महावीर सुनाऊ| संकट से प्रभु दीन उभारो, रिपु-दमन है नाम तिहारो| विद्या, धन, सम्मान की इच्छा, प्रभु आरोग्य की दे दो भिक्षा| स्वर्ण कमल यह चरण तुम्हारे, नेत्र जल से अरविंद पखारे| कलिमल की कालिख कटे, मांगू मैं वरदान|  रिद्धि-सिद्धि अंग-संग रहे,  सेवक लीजिए जान| श्री कुलपति कालीवीर प्यारे,  कलयुग के तुम अटल सहारे|  तेरो बिरद ऋषि-मुनि हैं गावें,  नाम तिहारा निसदिन धयावे| संतों के तुम सदा सहाई,  ईश पिता और कलिका माई| गले में तुम्हारे हीरा सोहे,  जो भक्तों के मन को मोहे| शीश मुकट पगड़ी संग साजे,  द्वार दुंदुभी, नौबत बाजे| हो अजानुभुज प्रभु कहलाते,  पत्थर फाड़ के जल निसराते| भुजदंड तुम्हारे लोह के खम्भे,  शक्ति दीन्ह तुम्हे माँ जगदम्बे| चरणन में जो स्नेह लगाई,  दुर्गम काज ताको सिद्ध हो जाई| तेरो नाम की युक्ति करता,  आवागमन के भय को हरता| जादू-टोना, मूठ भगावे,  तुरतहि सोए भाग्य जगावे| तेरो नाम का गोला दागे,  भूत...